लकड़हारे की परीक्षा

लकड़हारे की परीक्षा
बहुत समय पहले की बात है. बहुत दूर एक गाँव में एक लकड़हारा रहता था. वह अपना काम बहुत मन लगा कर करता था और बहुत ही ईमानदार और मेहनती भी था ,दूर दूर तक ये प्रसिद्ध था कि वह अपने ईमानदारी के धर्म से कभी नहीं हट सकता ,ये खबर स्वर्गलोक में भगवान तक भी पहुंच गयी ,और भगवान ने सोचा अवसर आने पर वो उसकी ईमानदारी की परीक्षा अवश्य लेंगे।
लकड़हारा रोज़ जंगल जाता कड़ी मेहनत करता ,और सूखी लकड़ियाँ काट -काट कर बाज़ार में बेचा करता था ,उससे जो थोड़ा बहुत मिलता उसी से अपनी जीविका चलता और खुश रहता था।

एक दिन, वह नदी के तट पर लगे सूखे पेड़ की लकडियाँ काट रहा था कि , अचानक उसे चक्कर सा आया और उसकी कुल्हड़ी जो उसकी आजीविका की जान थी, फिसल कर नीचे बह रही गहरी नदी में गिर गयी ,नदी बहुत ही गहरी थी इसलिए लकडहारा अपनी प्यारी कुल्हाड़ी को बाहर नहीं निकाल सकता था उसकी कुल्हाड़ी अब नदी में खो चुकी थी. वह बहुत दुखी हो कर अपने परिवार और आजीविका के बारे में सोच सोच कर सच्चे मन से भगवान् से सहायता की प्रार्थना कर रहा था .
सच्चे और ईमानदार लकड़हारे की प्रार्थना भगवान ने सुनी और सोचा की क्यों न इस विकट परिस्थिति में इस लकड़हारे की परीक्षा ली जाए
इसलिए भगवान ने उसके पास आकर पूछा, ” पुत्र ! क्यों परेशान हो मुझे क्यों पुकार रहे हो क्या समस्या हो गयी ? लकड़हारे ने अपनी सारी बात सारी परेशानी भगवान को बताई और भगवान् से अपनी कुल्हड़ी वापस पाने में सहायता की गुहार करने लगा .

भगवान ने अपना हाथ उठाकर गहरी नदी में डाला और चांदी की एक चमचमाती कुल्हाड़ी निकालकर लकड़हारे से पूछा, ” क्या यही है तुम्हारी कुल्हाड़ी है ?
लकड़हारे ने उस कुल्हाड़ी को देखा और पूरे धर्य से बोला, ” नहीं.प्रभु ये तो मैंने कभी देखी भी नहीं।
भगवान् ने सोचा इसे इस से भी ज्यादा लालच देता हूँ और भगवान ने अपना हाथ फिर से पानी में डाला और एक और कुल्हाड़ी निकाली अबकी बार ये सोने की बनी हुई थी.
भगवान ने उससे पूछा, ” क्या यह है तुम्हारी कुल्हाड़ी ?
लकड़हारे ने उस कुल्हाड़ी को अच्छी तरह देखा एक अपरिचित सी नज़र डाल के बोला, ” नहीं भगवान ! मैं गरीब आदमी हूँ ऐसी स्वर्ण कुल्हड़ी का तो मैं सपना भी नहीं देखता ये भला मेरी कैसे हो सकती है
भगवान बोले, ” ज़रा गौर से देखो , यह सोने की कुल्हाड़ी है, जो बहुत ही कीमती है. क्या सच में यह तुम्हारी नहीं ?
लकड़हारा बोला, ” नहीं ! प्रभु यह मेरी कुल्हाड़ी नहीं है. ये मेरे किसी काम की भी नहीं मैं सोने की कुल्हाड़ी से भला पेड़ कैसे काटूँगा ये मेरे काम की भी नहीं।
भगवान लकड़हारे की ईमानदारी देख क्र बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने मुस्कुरा के अपना हाथ फिर से गहरी नदी में डाला और एक और कुल्हाड़ी निकाली. यह कुल्हाड़ी लोहे की थी। भगवान ने फिर लकडहारे से पूछा, ” यह तुम्हारी कुल्हाड़ी है क्या ?
लकड़हारा कुल्हाड़ी देखकर बहुत खुश हुआ और श्रद्धापूर्वक हाथ जोड़ कर बोला बोला, ” जी हाँ, यही है मेरी कुल्हाड़ी है.मेरे परिवार की जीविका का साधन।
भगवान लकड़हारे की ईमानदारी देखकर बहुत प्रसन्न हुए. उन्होंने उसे वह लोहे की कुल्हाड़ी लौटा दी, साथ में उसे वो दो कुल्हाड़ी जो चांदी और सोने की बनी थी। उसकी ईमानदारी के लिए उसे ईनाम में भी दे दी.
लकड़हारा बड़ा खुश हुआ और बोलै भगवान् मैं इन का क्या करूँगा ये मेरे किसी काम की नहीं ,इन्हे आप ही रखे मुझे बस ये आशीर्वाद दे की मेरी लोहे की कुल्हाड़ी हमेशा सुरक्षित रहे और मैं हमेशा अपने परिवार का पालन पोषण करता रहूँ।
भगवान् ने उसे आशीर्वाद दिया और उसकी ईमानदारी देख कर गदगद हो उसे गले से लगा लिया ,और ईमानदारी के कारण लकड़हारे को जीते जी भगवान से मिलने का अवसर मिला।
शिक्षा :किसी भी परिस्थिति में हमे ईमानदारी की राह नहीं छोड़नी चाहिए।

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